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जालंधर: मुश्किलें Sarvodya Hospital मामले में डा. राजेश अग्रवाल सहित अन्य आरोपियों की बढ़ीं, हाईकोर्ट का FIR रद्द करने से इनकार, पढ़ें व देखें

बयूरो (गोलमाल न्यूज़) : जालंधर के मेडिकल क्षेत्र से जुड़े सर्वोदय अस्पताल संबंधी दर्ज FIR मामले में डॉ. राजेश अग्रवाल, डॉ. कपिल गुप्ता, डॉ. अनवर इब्राहिम खान और नोएडा के चार्टर्ड अकाउंटेंट संदीप कुमार सिंह की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। मामले में अहम मोड़ आया है। आरोपी डॉ. राजेश अग्रवाल ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग की थी जिस पर हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया है। वकील अनुसार माननीय अदालत ने कहा कि मामले की जांच और ट्रायल अभी बाकी है, इसलिए इस स्तर पर FIR रद्द करना उचित नहीं होगा।

गौरतलब है कि इस केस में इलाका मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद FIR नंबर 233 / 23.12.25 नवी बारादरी थाने में रजिस्टर की गई थी। आरोपियों पर IPC की धारा 420, 465, 467, 468, 471, 477-A और 120-B लगाई गई थी। उक्त धाराएं Non-Bailable अपराध की हैं।

पूरा मामला डॉ. पंकज त्रिवेदी की ओर से जनवरी 2024 में दी गई शिकायत से जुड़ा है, जिसमें सर्वोदया हॉस्पिटल के कुछ सह मालिकों व सीए पर उनके साथ फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप लगाए गए थे। उल्लेखनीय है इनमें से डॉ. राजेश अग्रवाल और डॉ. संजय मित्तल का संबंध साल 2015 के चर्चित किडनी कांड से भी है, जिसमें उनके खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमे माननीय कोर्ट में लंबित हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सीए संदीप कुमार सिंह को इस उद्देश्य से नियुक्त किया गया ताकि आरोपी डॉक्टर निजी लाभ हासिल कर सकें। आरोप है कि फर्जी बैलेंस शीट तैयार की गई और आयकर रिटर्न दाखिल किए गए। शिकायतकर्ता के अनुसार जिन दस्तावेजों पर डॉ. पंकज त्रिवेदी के हस्ताक्षर करवाए गए, उनमें पार्टनर डॉक्टरों की सैलरी तक नहीं दिखाई गई। बाद में नया यूडीआईएन (UDIN) बनाकर कथित रूप से फर्जी बैलेंस शीट और रिटर्न पोर्टल पर अपलोड कर दिए गए।

ICAI (इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया) ने दोनों यूडीआईएन लॉक किए

इसी मामले में एक नया अपडेट यह है कि केस की गंभीरता को देखते हुए ICAI (इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया) ने संबंधित दोनों यूडीआईएन को अपनी वेबसाइट पर लॉक कर दिया है ताकि उनमें किसी प्रकार का फेरबदल न किया जा सके। बताया जा रहा है कि जिस बैलेंस शीट को अपलोड किया गया, उस पर डॉ. पंकज त्रिवेदी और अन्य पार्टनर्स के हस्ताक्षर नहीं थे। सूत्रों के अनुसार जब बैंक के पास अधूरे दस्तावेज पहुंचे तो बैंक ने सभी पार्टनर्स को ईमेल भेजकर उनके हस्ताक्षरयुक्त दस्तावेज मांगे, जिसके बाद फर्जीवाड़े का मामला सामने आया।

मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अदालत में पेश रिपोर्ट में पुलिस ने कहा था कि शिकायत किसी अन्य मामले से संबंधित थी और डीए लीगल कार्यालय में डॉ. पंकज त्रिवेदी से जुड़ा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। हालांकि आरटीआई के माध्यम से शिकायतकर्ता ने उसी कार्यालय से संबंधित रिकॉर्ड और रिपोर्ट प्राप्त कर ली थी। मामले में कई महीनों से SIT रिपोर्ट का भी माननीय कोर्ट में इंतज़ार लंबित है।