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जालंधर: बड़ी जीत धर्म की !, एडवोकेट प्रभजोत, तरणजोत व मेहरजोत सिडाना के तर्क पर अदालत ने मां भगवती सेवा संघ वेलफेयर सोसाइटी के आयोजकों के खिलाफ ‘जागरण’ को लेकर लंबित मानहानि मुकदमा किया खारिज, पदाधिकारियों को किया गया बरी, पढ़ें व देखें

ब्यूरो: जालंधर के पॉश इलाके न्यू जवाहर नगर में जारी एक विवाद आज माननीय अदालत के फैसले के बाद थम गया। जानकारी अनुसार धर्म की बड़ी जीत हुई है। इस का जरिया पगड़ीधारी एडवोकेट प्रभजोत सिंह सिडाना, एडवोकेट तरणजोत सिंह सिडाना और एडवोकेट मेहरजोत सिंह सिडाना बने हैं।

दरअसल स्थानीय धार्मिक कल्याण समिति के प्रबंधन को एक बड़ी राहत देते हुए, सुमित गर्ग (जेएमआईसी और सिविल जूनियर डिवीजन) की अदालत ने न्यू जवाहर नगर में एक वार्षिक धार्मिक जागरण से जुड़े लंबे समय से चल रहे दीवानी और फौजदारी मुकदमों को खारिज कर दिया है और आरोपी पदाधिकारियों को बरी कर दिया है।

यह कानूनी लड़ाई स्थानीय निवासी जसमीत सिंह द्वारा मां भगवती सेवा संघ वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष राजिंदर सहगल और सोसाइटी के सदस्य अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायतों से जुड़ी है।

मामले की पृष्ठभूमि और आरोप

मां भगवती सेवा संघ वेलफेयर सोसाइटी पिछले करीब 3 दशकों से भी अधिक समय से न्यू जवाहर नगर, जालंधर में वार्षिक जागरण आयोजित करती आ रही है।

वर्ष 2019 में, जसमीत सिंह ने हर्जाने के लिए एक दीवानी मुकदमा दायर किया, जिसके बाद 2020 में एक आपराधिक शिकायत दर्ज की गई। वादी ने आरोप लगाया था कि, सोसाइटी के नेताओं ने अपमानजनक टिप्पणियां कीं, जिससे उनकी छवि धूमिल हुई (सबूत के तौर पर 1 वीडियो रिकॉर्डिंग का हवाला दिया गया)।

वार्षिक जागरण का आयोजन नगर निगम, डीसी कार्यालय और अन्य संबंधित अधिकारियों से अनिवार्य अनुमति लिए बिना किया गया था। इस कार्यक्रम में कथित तौर पर बिजली की चोरी और लाउडस्पीकरों द्वारा उत्पन्न उपद्रव शामिल था, जिससे स्थानीय निवासियों की शांति भंग हुई।

बचाव पक्ष की दलीलें

बचाव पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों प्रभजोत सिंह सिडाना, तरणजोत सिंह सिडाना और मेहरजोत सिंह सिडाना ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की स्वीकार्यता और सत्यता पर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने तर्क दिया कि, कथित वीडियो क्लिप की अभिरक्षा की श्रृंखला (चैन ऑफ कस्टडी) को कभी भी कानूनी रूप से स्थापित नहीं किया गया था, और साक्ष्य अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों को पूरा नहीं किया गया था।

जिरह के दौरान, वादी ने स्वीकार किया कि वीडियो फुटेज को 2 बार काटा गया था और फिर शुरू किया गया था, जो स्पष्ट छेड़छाड़ की ओर इशारा करता है और क्लिप को अविश्वसनीय बनाता है।

वादी सोसाइटी और उसके सदस्यों पर लगाए गए किसी भी गंभीर आरोप को साबित करने में विफल रहा, जिससे न्यायिक पत्रावली विश्वसनीय साक्ष्यों से रहित हो गई।

अदालत का फैसला

बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा प्रस्तुत ठोस तर्कों को स्वीकार करते हुए, माननीय न्यायालय ने हर्जाने के दीवानी मुकदमे को खारिज कर दिया और आपराधिक मामले में राजिंदर सहगल तथा अशोक कुमार अग्रवाल को बरी कर दिया। इसके साथ ही पारंपरिक मोहल्ले के आयोजन को लेकर चल रहे कई वर्षों पुराने विवाद का कानूनी रूप से अंत हो गया है।