ब्यूरो: ममता बनर्जी ने मई में पश्चिम बंगाल गंवाया और सितंबर में तृणमूल कांग्रेस का नाम और दो फूल जोड़ा चुनाव चिह्न भी छोड़ना पड़ रहा है। हालांकि, इनका इस्तेमाल अरूप रॉय गुट भी नहीं कर सकेगा। अंतरिम आदेश के जरिए मुख्य नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया गया है। आगे जाकर स्थिति बदल भी सकती है।
पहले समझते हैं कि अगर एक ही पार्टी में दो गुट बन जाते हैं और दोनों ही मुख्य दल होने का दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग फैसला किस तरह से लेता है। चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968, यह वही आदेश है जिसका इस्तेमाल करके चुनाव आयोग एक पूरी प्रक्रिया से गुजरता और पता लगाता है कि किसे पार्टी का चुनाव चिह्न, झंडा और नाम मिलेगा। इसमें भी धारा 15 बेहद अहम है।
इस कानून की धारा 15 के अनुसार, ‘जब आयोग को अपने पास मौजूद जानकारी से यह पता चलता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के विरोधी गुट या समूह हैं और हर कोई खुद को ही वह असली दल बताता है। ऐसे में आयोग मामले से जुड़े सभी उपलब्ध तथ्यों और हालात पर विचार करने और उन गुटों या समूहों के नेताओं और अन्य लोगों की बात सुनने के बाद यह तय कर सकता है कि उन विरोधी गुटों या समूहों में से कोई एक ही वह मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है या उनमें से कोई भी नहीं है। आयोग का यह फैसला उन सभी विरोधी गुटों या समूहों पर लागू होगा।’
आसान भाषा में एक जानकार बताते हैं कि चुनाव आयोग इस बात पर फोकस करेगा कि दोनों गुटों में संगठन स्तर पर कितने सदस्य हैं। साथ ही विधायकों और सांसदों की गिनती भी अहम भूमिका निभाएगी। दोनों पक्ष इसकी जानकारी एक हलफनामे के जरिए देंगे। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी बताते हैं कि आयोग ‘रूल ऑफ मेजॉरिटी’ के आधार पर फैसला करता है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जांच करेगा कि किस गुट के पास सांसद, विधायक और संगठन पर ज्यादा समर्थन है।